मै देख रहा था
12:50 PM | Author: rohit
मै देख रहा था उन पेडों को, उन पत्तों को उन फूलों को.
मै देख रहा था धारा को, और बहते हुए किनारों को.

उम्मीद भरी उन शाखाओं को, जिन पर कुछ पंछी रहते थे.
जो अपनी मीठी बोली से, बस भाव ख़ुशी के कहते थे.
मै देख रहा था ख़ुशी वो उनकी, ढूंढ रहा था भावों को.
मै देख रहा था उन पेडों को, और उनकी ठंडी छाव को.

फिर हवा चली ठंडी शीतल, और फूल झुके शर्माते से.
महक उडी मीठी सी एक, और पत्ते हिले घबराते से.
कईं लोग खड़े थे नदी किनारे, हाथों में तलवारें थी.
बच्चे थे छोटे झगड़ रहे, और गूंज रही किलकारी थी.

मै देख रहा था दृश्य वो, और उसके सभी किरदारों को.
मै देख रहा था जीवन को, और उसके रूप हजारों को.

किसे पता है वृक्ष बसेरा, पंछी को दे देते हैं.
हो सकता है शातिर पंछी, छीन उसे बस लेते हैं.
कौन है कहता हवा है शीतल, और कलियाँ यूँ शर्माती हैं.
हो सकता है चोर हवा है, जो महक चुरा ले जाती है.

क्या जान सका है कोई वो पंछी बातें क्या करते हैं.
फिर क्यों उनके झगडे भी हमको मीठे से ही लगते हैं?
फिर भी न सोचा ये हमने इतने वर्षों की रचना में.
पर दो बच्चे गर झगड़ पड़ें तो धर्म की बातें करते हैं.

मै देख रहा था मानुष को, और बदल रहे विचारों को.
मै देख रहा था नर्क को चुनते, स्वर्ग में रहने वालों को.

मै देख रहा था उन पेडों को, उन पत्तों को उन फूलों को.
मै देख रहा था धारा को, और बहते हुए किनारों को.
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13 comments:

On July 24, 2009 at 2:49 AM , Rahul Arora said...

bahut acha ha..!!! very touchy..!!

 
On July 28, 2009 at 11:26 AM , rohit said...

thanku bhai....

 
On August 1, 2009 at 12:22 PM , Thoughts.. said...

This is brilliant stuff..

 
On August 1, 2009 at 12:22 PM , Abhishek Vyas said...

Brilliant stuff

 
On August 2, 2009 at 2:42 PM , rohit said...

dhanyavaad vyas bhai..... and thanks to Thoughts as well.... but i would like to know your name sir...

 
On August 5, 2009 at 7:45 AM , Chandan Kumar Jha said...

उम्दा रचना. आभार.

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

गुलमोहर का फूल

 
On August 5, 2009 at 9:04 PM , RAJIV MAHESHWARI said...

मुझे आपके इस सुन्‍दर से ब्‍लाग को देखने का अवसर मिला, नाम के अनुरूप बहुत ही खूबसूरती के साथ आपने इन्‍हें प्रस्‍तुत किया आभार् !!

 
On August 5, 2009 at 10:14 PM , गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

bahut damdar.narayan narayan

 
On August 6, 2009 at 2:33 AM , शशांक शुक्ला said...

सुंदर रचना

 
On August 11, 2009 at 11:43 AM , संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

 
On August 12, 2009 at 3:11 AM , Meraj Ahmad said...

shuruat utsahjanak hai!yahi jazba baraqarar rahe.gazam ki kalpana hai.

 
On August 12, 2009 at 3:11 AM , Meraj Ahmad said...

shuruat utsahjanak hai!yahi jazba baraqarar rahe.gazam ki kalpana hai.

 
On August 25, 2009 at 6:51 AM , rohit said...

chandan ji, rajeev ji, narad ji, shashank ji, sangeeta ji aur meraj ji.... aap sabka bohot bohot dhanyavaaad ki aap logon ne meri kavitaao ko padha aur itne achhe comments bhi kiye.... :-)